उस सफेद सिरहाने से लगकर,
खिड़की से दिखती रोशन रात मे सिमटकर
सिसक सिसक कर, थोड़ा हम रो लिए
कुछ आंसुओ को अकेले में, हम जी लिए
गम न था किसी बात का कोई ...
पर हर तरफ बिखरे दिल के घाव थे...
जैसे चली ट्रैन ...
मानो खुल गया कोई वो भरता हुआ घाव
जो बना था शायद -
कुछ यादों से, नकारे वादों से, नापाक इरादों से, या बस जिंदगी कि लिखी लकीरों से...
ट्रेन के चलने से लगा
जिंदगी चल पड़ी है किसी दिशा में...
छोड़ के बीते रिश्तों को, बातों को, यादों को या याद दिलाने वाले ख्वाबों को...
काश...चलते रहेँ यू ही हम, बिन दिशा के, बिन आस के,
शायद अनजानी राहें, मिलवा दे मेरे मन को उस विश्वास से,
' जिंदगी' जीने के, बे झिझक उस अंदाज से।
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