ए लम्हे,
ले चल मुझे अपने साथ, उन पलों के पास जहां मै - एक आजाद पंछी की तरह उड़ान भरू।
जहां में बहते निर्मल पानी सी बस अपने बहाव में रहूं।
ए लम्हे,
रोज़ ऐसे पलों को मैं जीती हूँ,
जो या तो मुझमें बसे ज्वाला से जलते है,
या दबी सी कुछ यादों में बस आना जाना करते हैं।
ए लम्हे,
कह दो को तुम मेरे अपने हो,
और तुममें मैं संपूर्ण हूँ।
खुला असमान सा ये एहसास हो
न कोई आस हो न कोई पास...
बस मैं और एक लम्हा!
