यह मनचला मन,
कई बार... ले चलता है मुझे
उन जगहों पर,
उन फिज़ाओं में,
उन यादों में...
उन फिज़ाओं में,
उन यादों में...
ताकि,
अपने अकेले आज में,
बिछड़े उस एक एहसास में,
फिर से ढूँढ सकूँ उस 'मैं' को—
जो तब वहाँ होकर भी नहीं थी,
और अपने आज में, न होकर भी है।
बिछड़े उस एक एहसास में,
फिर से ढूँढ सकूँ उस 'मैं' को—
जो तब वहाँ होकर भी नहीं थी,
और अपने आज में, न होकर भी है।

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