किससे कहती कि शायद कहीं रुक जाने से डरती थी मैं,
फिर वो - एक जगह, एक घर, जिंदगी हो या कोई रिश्ता...
पर जाने अनजाने में इस डर से भागते भागते भूल ही गई कि कहीं दूर,
अपने ही अंदर में बस रुक सी गई हूं मैं,
जैसे जिंदगी से ऐसी झूठी उम्मीद बांधे हो कि वो हाथ थामकर ले चले...
पर भूल ही गई थी कि - 'मैं' ही मेरी जिंदगी हूं!
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